खुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन यूँ है के तुझे भूल के देखेंगे किसी दिन.......
भटके हुए फिरते हैं कई लफ्ज़ जो दिल में दुनिया ने दिया वक़्त तो लिक्खेंगे किसी दिन........
आपस की किसी बात का मिलता ही नहीं वक़्त हर बार ये कहे हैं के बैठेंगे किसी दिन........
जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक आँखों में तेरी डूब के देखेंगे किसी दिन........
खुशबू से भरी शाम में जुगनू के कलम से इक नज़्म तेरे वास्ते लिक्खेंगे किसी दिन......
कभी मिलन उन गलियों में जहाँ छुप्पन-छुपाई में हमनें रात जगाई थी...
जहाँ हर खुशी हर ग़म में दोस्तों से गले मिलने के लिए धर्म और जात की दीवारें गिराई थी...
कई दफे यूँ ही उदास हुए तो दोस्तों ने वक़्त बे-वक़्त जुगनू पकड़ के जश्न मनाई थी...
जब गया कोई दोस्त वो गली छोड़ के तो याद में आँखों को महीनों रुलाई थी...
गली अब भी वही थी पर वो वक़्त नहीं, वो दोस्त नहीं हरे घास थे जहाँ वहाँ बस काई उग आई थी...

Superb lines
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