Monday, July 2, 2018

यशाचा टेलीग्राम

By:- गिरिष देशमुख




ध्येय निश्चित झालं, 
की वाट आपोआप सापडते.... 

न करण्याला हजार कारणं देण्याऎवजी 
करण्यासाठी एकच कारण पुरेसं ठरते.... 

सुरुवात कुठून तरी करायाची असते, 
छोटी किवा मोठी पहायची नसते... 

ध्येयावरच प्रेम करत, 
वादळ प्यायचं असतं.... 


यशच्या फळासाठी 
अपयशाचे विष पचवण्याची सवय करावी लागते.... 

यश लगेच नसते मिळत , 
त्यासाठी मेहनत घ्यावीच लागते... 

हरली मेच एकदा , 
म्हणून खेळणे सोडायचे नसते.... 

एकदा नकार आला , 
म्हणून रडायचे नसते.... 

ज्याने नाकारले, 
त्यालाही उद्या लाज वाटेल, 
असे स्वताला घडवायचे असते.... 

अडथळे येतील रोजच मित्रांनो , 
म्हणून चालणे सोडायचे नसते.... 

साच्यात ठेवून स्वताला , 
कुणी मुक्त आकाश गाठू शकल नसत.... 

आज उन आहे म्हणून काय झाले , 
उद्या तुज्याच यशाचा पावूस नक्की पडेल.... 

अपयश आल्या खेरीज, 
यश येत नाही.... 

ट्युशन वर प्रेम करण्यापेक्षा , 
पुस्तकांना मित्र कर.... 

अपयश येईल , 
आणि उद्याच्या यशाचा टेलीग्राम देवून जाईल..... 

ज़िन्दगी

By:- नितेश शर्मा




ज़िन्दगी कभी हँसाती है कभी रुलाती है 



कभी ख़ुशी देती है कभी गम देती है 



फिर भी जीना तो हर हाल में पड़ता है 



कुछ खो कर,तो कुछ पा कर रहना पड़ता है



बस यही ज़िंदगी है यही सब कुछ है 



कुछ भी नहीं पास मेरे 



तेरी यादें ही सब कुछ है 



सब कुछ खो कर भी 



बहुत सारी यादें छोड़ जाती है 



ज़िन्दगी कभी हँसाती है कभी रुलाती है 



कभी खुशी कभी गम दे जाती है 



रोने से क्या होगा हमेशा खुश रहना चाहिए 



सबकी खुशी  के लिए हमेशा खुश रहना चाहिए 



अपने लिए ना सही अपनों के लिए जीना चाहिए 



बस -बस ऐसे ही ज़िन्दगी जीना चाहिये  



ज़िन्दगी हर सुख़ हर सुख में 



बहुत कुछ सिखाती है 



ज़िन्दगी कभी हँसाती है कभी रुलाती है 



कभी खुशी दे जाती है कभी गम दे जाती है 



कुछ भी नहीं है मेरे पास ये सोचना छोड़ दो 



हर दुःख ,तकलीफो को भूल कर  



ज़िन्दगी जिओ तुम्हारा खुश रहना ही 



तुम्हारी ज़िन्दगी है सबको प्यार दो, खुशी दो , 



छोटी ही सही पर ज़िन्दगी यही सिखाती है 



कभी हँसाती है कभी रुलाती है 



कई यादें दिल में छोड़ जाती है 



किसी से कुछ भी उम्मीद मत रखो 



सदा आगे बढ़ते रहना चाहिए 



ज़िन्दगी कभी हँसाती है कभी रुलाती है 


कभी खुशी देती है कभी गम देती है

Monday, June 18, 2018

My Home!!!




This is my home.
Gazing out to the distant horizon,
I can sense the tranquility in the air.
A young wallaby cautiously bounds out from the scrub
As I venture further into its territory.

Mesmerized, I cannot take my eyes away
From the stunning silhouettes of the once-tamed brumbies,
Dancing on the horizon.
The muffled scratching of the chickens disturbs my thoughts,
As they aimlessly graze in the shade of a drooping wattle tree.
Someone's at the gate.

Our German Shepherd eagerly darts out to greet the newcomer:
A mate of my fathers,
Here for an afternoon beer.
Sitting in the old, weathered tree house,
I listen to the friendly chatter of the two friends
Telling bush yarns around the glowing campfire.

I can hear my mother's voice,
Calling contentedly from the veranda.
I take one last glance at the bright, starlit sky…
This is my home.

म्हातारीचा वाडा




गर्द अंधा‍-या वाड्यामध्ये... पिशाच्चांचा राडा

असा गावाच्या वेशीबाहेर.. म्हातारीचा वाडा




म्हातारीच्या वाड्यात म्हणे...


सत्तावन्न खोल्या

सावल्यांनी भरलेल्या अन

र‍‍क्‍तानं त्या ओल्या

गेला कोणी वाड्यामध्ये

तर येणे परत नाही

आणखिन एक सावली वाढे,
तरी खोली भरत नाही




वाड्यामधल्या हरेक खोलीत

येतो म्हातारीचा वास

कधी ऐकु येते किंकाळी

कधी पुटपुटण्याचा भास




आमोशाच्या रात्री इथं

कुणी बाळ रडत असतं

वाड्यामागचं झाड वडाचं

दात विचकुन हसतं 




कुबट कुजगट म्हातारीची

जळलेली कातडी

बाहेर लोंबता.. फुटका डोळा

अन मान जरा वाकडी




हळद कुंकु... मिरच्या लिंबु

पसरलं असतं घरभर

चिमुरड्यांच्या रक्तासाठी

चटावलेलं तळघर




तळघरात ह्या खेचुन नेतो

सरपटणारा पंजा

कोवळ्या जीवावर ताव मारतो

अतृप्त अघोरी मुंजा




सळसळणा-या जिभाच काढी खळखळणारा ओढा

असा गावाच्या वेशीबाहेर.. म्हातारीचा वाडा




एक पोर चिमुकली.. रस्ता चुकली

खेळत गेली वाड्याकडे

हे बघणा-या गावक-याच्या

जीवाचा थरकाप उडे




पोर ती वेडी.. ओढली गेली

हडळीच्या अमलाखाली

ओलांडुन उंबरा वाड्याचा

भारावुन ती आत निघाली




घाबरुन ...तरी धीर धरुन

आत गावकरी शिरला अंती

लागत गेले दरवाजे अन

खसखसली ती तटबंदी




बाधीत ती... संमोहीत ती

जीव निरागस भूल पडे

गावक-याला दिसला पंजा

सरपटताना तिच्याकडे




कुजबुजले कुणी खोल्यांमधुनी

होणार वाटते घात हिचा

तो धावला जीवाच्या आकांताने

धरुन ओढला हात तिचा




पण क्षणात त्याचा जीव गोठला....




क्षणात त्याचा जीव गोठला

श्वासाचा चोळामोळा

त्या चिमुकलीला नव्हता पंजा

लोंबत होता.... फुटका डोळा




चेकाळत मग आला पंजा

सावल्या लागल्या फेर धरु

होऊन चिमुकली, म्हातारीने

पचवले शेकडो वाटसरु




पुन्हा विचकले दात वडाने, हसला रक्‍तपिपासु ओढा

असा गावाच्या वेशीबाहेर.. .....म्हातारीचा वाडा


Tuesday, June 12, 2018

चिड़िया

चिड़िया
अब नहीं लाती दाना।
घोंसले में छिपे
बच्चों के लिए।

जो, अब लगने लगे हैं
उसे पराए से।
वह सोचती है कि
बच्चे भी सोचते हैं।

ऐसा ही कुछ
शायद इसीलिए।
वे अब खुद चुगते हैं दाना
कुछ भी नहीं कहते उससे।




और चिड़िया
कोशिश नहीं करती।
दाना उठाने की
जो बच्चों की चोंच से

गिर जाता है बार-बार

घोंसले में...।
क्योंकि परायों के लिए
कोई कुछ नहीं करता।


इतना छोटा बना घोंसला,
इसमें तुम कैसे रहती हो। 
इसमें जगह कहां है चिड़िया,
जिसको अपना घर कहती हो।   
कहां तुम्हारा शयन कक्ष है,
कहां तुम्हारा बैठक खाना। 
यह भी तो बतला दो चिड़िया
कहां बनाती हो तुम खाना। 
बेटे-बहू तुम्हारे होंगे,
उनके कमरे कहां-कहां हैं। 
ब्याह किए होंगे बिटियों के,
पते बताओ जहां-जहां हैं। 
नाती-पोते साथ तुम्हारे,
रहते हैं या अलग-अलग हैं। 
सेवा करते कभी तुम्हारी,
बोलो उनके क्या रंग-ढंग हैं। 
बातें सुनकर चिड़िया रानी,
खूब हंसी, हंसकर मुस्काई। 
बोली अरे अक्ल के दुश्मन,
दुनिया तुमको समझ न आई। 
हम पंछी तो एक नीड़ में,
दुनिया नई बसा लेते हैं।
वही हमारे बैठक खाने,
भोजन कक्ष वहीं होते हैं। 
अपना-अपना काम हम सभी,
अपने हाथों से करते हैं।
छोटे से छोटे बच्चे भी,
अपने पर निर्भर रहते हैं। 
नहीं जोड़ते दाना-पानी,
न ही बंगले-महल बनाते। 
न नुकसान-नफे के हमको,
कोई भी दुःख-दर्द सताते। 
नहीं बुढ़ापा हमको आता,
कभी नहीं बीमार पड़े हम। 
किसी डॉक्टर किसी वैद्य के,
यहां कभी भी नहीं गए हम। 
यह सारा संसार हमारा,
धरती सारा अपना घर है। 
यह तन तो नश्वर है भाई,
एक आत्मा अजर-अमर है।

Saturday, June 9, 2018

✒✒✒लिक्खेंगे किसी दिन ✒✒✒



खुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन यूँ है के तुझे भूल के देखेंगे किसी दिन.......


भटके हुए फिरते हैं कई लफ्ज़ जो दिल में दुनिया ने दिया वक़्त तो लिक्खेंगे किसी दिन........


आपस की किसी बात का मिलता ही नहीं वक़्त हर बार ये कहे हैं के बैठेंगे किसी दिन........


जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक आँखों में तेरी डूब के देखेंगे किसी दिन........


खुशबू से भरी शाम में जुगनू के कलम से इक नज़्म तेरे वास्ते लिक्खेंगे किसी दिन......


कभी मिलन उन गलियों में जहाँ छुप्पन-छुपाई में हमनें रात जगाई थी...


जहाँ गुड्डे-गुड़ियों की शादी में दोस्तों की बारात बुलाई थी...



जहाँ स्कूल खत्म होते ही अपनी हँसी-ठिठोली की अनगिनत महफिलें सजाई थी...



जहाँ पिकनिक मनाने के लिए अपने ही घर से न जाने कितनी ही चीज़ें चुराई थी...


जहाँ हर खुशी हर ग़म में दोस्तों से गले मिलने के लिए धर्म और जात की दीवारें गिराई थी...


कई दफे यूँ ही उदास हुए तो दोस्तों ने वक़्त बे-वक़्त जुगनू पकड़ के जश्न मनाई थी...


जब गया कोई दोस्त वो गली छोड़ के तो याद में आँखों को महीनों रुलाई थी...


गली अब भी वही  थी पर वो वक़्त नहीं, वो दोस्त नहीं हरे घास थे जहाँ वहाँ बस काई उग आई  थी...

यशाचा टेलीग्राम

By:-  गिरिष देशमुख ध्येय निश्चित झालं,  की वाट आपोआप सापडते....  न करण्याला हजार कारणं देण्याऎवजी  करण्यासाठी एकच कार...